Friday, June 23, 2017

VARSHNEY VAISHYA HISTORY - वार्ष्णेय वैश्य इतिहास



Shri Krishna has been addressed as Varshney in Verse 40-Chapter 1 and Verse 36-Chapter 3 of Bhagavad Gita , as of Vrishnilineage. Barahsaini or Varshney Vaish regard themselves as descendants of Akrurji of the same lineage,which was primarily settled in Vrij (or Braj).

Advent of Indian Culture

At the beginning of the present 28th Chaturyug of 7th Manvantar, Caspian Sea isolated to form a lake like large water body. Offsprings of great sage Kashyap and Aditi,daughter of Daksh Prajapati thrived along the banks of this water body. Their son Vivaswan continued the lineage with Shraddhdev(Manu) ,Ila, Aayu, Nahusha and Yayati.

Vedic- Saraswati Culture in Central Part of Bharat- Varsh

The Great Saraswati River originated from Bandarpunch massif of Himalayas. Sutudri or Sutlej from Mt. Kailash merged with Saraswati near present day Satrana (Punjab). Yamuna from Yamunotri also assisted the Saraswati at present day Paonta Sahib(Himachal Pradesh).
Saraswati River flowed parallel to Sindhu river from Mt.Kailash, on its west side and Drisadvati river from Shivalik hills on its east side. All the three rivers flowed from North to South. Biggest of these, Saraswati traversed through Punjab, Haryana, and Rajasthan, finally falling in Arabian sea at Rann of Kutch in Gujarat.
The son of great king Yayati,Yadu migrated along the banks of Saraswati and settled at lower plains of Middle Bharat. Marriage system was first adopted in this region. Thus man dominated lineage or Vansh started .

There were heavy settlements along the Saraswati river ,as water resources were of prime importance for this agrigarian society. They were grouped in small units lead by a Vish-pati and common man was called Vish. These people were trading overseas with other cultures of the same period.Saraswati river provided them the passage to the sea. 

Later the Vish changed to Vaish , the first evolved varna of later adopted four Varnas. Rigveda also originated and propogated as hymns ,as there was no writing script. 

Yadu vansh or lineage continued with Shahastrajit,Satjit,Haihaya,Dharm,Netra,Kunti,Sohajji,Mahishman,Bhadrasen,Dhanak,Kratveerya,KartveeryaArjun,Jaydhwaj,Taljangh,Veetihotra or Vrisha.

Vrij and Vrishni

Vrij was a region falling within the present Jaipur, Agra And Delhi (Indraprashtha).This region,named after Vrisha, was traditionally acknowledged as Golden triangle.Its centre Madhupuri or Mathura was known after Madhu who was the son of Vrisha and father of Vrishni.

The Supreme god Vishnu took birth in Vrishni lineage.He established the might of Bharat through economic,political and cultural developments,which sustained through thousands of years and changed the entire world .To develop economy, coins and seals were introduced. Units of weights and measures were adopted. Writing scripts with alphabets and numbers were mooted and organised by rules of grammer and maths.As a result,all of the four Vedas originated till then ,were scripted and preserved. Vrijarea was the main region of all these activities. Dwarika was an international trade city.Vrij andDwarika, both were ruled as the republics, which was the new form of polity.
Later identified Sindhu or Indus valley civilisation was actually remnant of the Saraswati civilisation.The whole of the world adopted original economic,political and intellectual systems of Bharat-Varsh to develop their own lands.

Decline of the Vedic culture

Almost 3900 years ago, due to tectonic plate movements Sutudri/Sutlej turned abruptly at present Ropar (Punjab) and finally merged with Sindhu.While Yamuna shifted its course to the east. Remnant Saraswati subsided before reaching to Rajasthan. It dried up in Rajasthan which was once a very thriving area, leaving it a desert.

Varnas system classified the society on the basis of work efficiency and aptitude but with equal rights and flexibility. It slowly changed into rigid caste system based on births,which gave unequal rights and discriminated people.Thus a vibrant and knowledge based society so badly fell from its height that ,it again and again was routed by foreign invasions.The very heart of civilisation ,Vrij ,was ruined and ruled By Mugals at Agra and then Delhi.Illustrious Vrishni lineage of Vrij got so severe drubbings that, even the memories of its golden past have been wiped out.











साभार:  
Varshney History
varshneyhistory.blogspot.in/


Thursday, June 22, 2017

शत्-शत् नमन 22 जून/बलिदान-दिवस,नगर सेठ अमरचन्द बांठिया को फांसी।



स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।

अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।

उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें, पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। "ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।"

अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे, पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।

अब अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। यह बहुत कठिन घड़ी थी, पर सेठ जी विचलित नहीं हुए। इस पर उनके पुत्र को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया गया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया। इसके बाद सेठ जी के लिए 22 जून, 1858 को फाँसी की तिथि निश्चित कर दी गयी। इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया गया कि सेठ जी को 'सर्राफा बाजार' में ही फाँसी दी जाएगी।

अन्ततः 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे। अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दी गयी, पर धर्मप्रेमी सेठ जी को फाँसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया। एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फाँसी दी जा रही थी। तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया।

सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
...................................................


घनश्याम अगरवाल की फेसबुक वाल से साभार 

Wednesday, June 21, 2017

वैश्य समुदाय से आपत्ति क्यों......

जिन्हें वैश्य समुदाय(बनिया, पटेल, खत्री, अरोड़ा, सिन्धी, सूद, भाटिया, लोहाना, चेट्टियार, शेट्टी, चेट्टी, मुदलियार, नाडार, वन्नियार, जैन, तेली, साहू, राठोड़, कलवार, कायस्थ, आदि) से आपत्ति हैं. --उनके लिए -- कुछ निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ.

इसे पढ़ कर वैश्यों के बारे में धारणा ठीक हो जाएगी जिन्हे कुछ भी भ्रम है --

भारत में वैश्यों की स्तिथि --इन तथ्यों को भी जान लें -

-- सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
-- सम्राट अशोक
-- गुप्त वंश के सम्राट
-- सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
-- सम्राट समुद्रगुप्त
-- सम्राट हर्षवर्धन
-- भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमू विक्रमादित्य 
--ःभारत के राष्ट्र पिता महात्मा गांधी
--पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा 
--प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रमोदी
--भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह 
--भारत के कुल इनकम टैक्स में 64% योगदान -
--भारत में विभिन्न प्रकार के दिए जाने वाले दान में 62% योगदान -
--लगभग 12000 गोशालाओं का सुचारु संचालन -
--भारत के 46% शेयर ब्रोकर बनिए हैं -
--भारत की GDP में लगभग 60% योगदान -
--बनिए भारत की कुल संपत्ति के 38% पर मालिकाना अधिकार रखते हैं -
--लगभग 35% चार्टर्ड अकाउंटेंट बनिए हैं -
--18% इंजीनियर-
--20% डॉक्टर -
--21% कंपनी सेक्रेटरी -
--21% कॉस्ट अकाउंटेंट -
--17% एम् बी ए, 12% वकील -
--लगभग 80% से ज्यादा धर्मशालाएं बनियों द्वारा संचालित हैं -
--मंदिरों में दिए जाने वाले दान में सबसे जयादा हिस्सा बनियों का होता है --
ये बनियों के मालिकाना हक़ वाली कुछ कंपनियों की सूची है --
--जिंदल स्टील -
--मित्तल आर्सेलर स्टील -
--भारती एयरटेल -
--जेट एयरवेज-
--वेदांता स्टरलाइट -
--ज़ी ग्रुप (एस्सेल ग्रुप)
--बिग बाजार -
--रिलायंस ग्रुप -
--टेली सोलुशन -
--ग्रासिम -
--हिंडालको-
--आईडिया सेलुलर -
--सन फार्मा -
--एस्सार स्टील-
--अम्बुजा सीमेंट -
--डालमियां सीमेंट -
--अल्ट्राटेक सीमेंट -
--विक्रम सीमेंट -
--जे के सीमेंट -
--हिंदुस्तान मोटर्स -
--बजाज ऑटो -
--टाइम्स ऑफ़ इंडिया -
--हिंदुस्तान टाइम्स -
--अमर उजाला -
--दैनिक जागरण -
--दैनिक भास्कर -
--दिव्या भास्कर -
--लोकमत -
--इंडियन एक्सप्रेस -
--फ्लिपकार्ट -

साथ ही जी टीवी, टीवी 18, इ टीवी, नेटवर्क 18, आज तक, ABP NEWS 
--Myntra- 
--yebhi-
--Indiamart-
--Zamato -
--snapdeal -

इतना सब कुछ और जनसँख्या 20 करोड़ ---और -- वो भी बिना किसी आरक्षण के ! आगे बढ़ने के लिए दिमाग और मेहनत चाहिए। अपना स्वाभिमान हैं. अपनी मेहनत हैं, इसलिए तो सबसे आगे हैं. यह तो एक झलकी हैं मेरे दोस्त, आगे तो पूरी रामायण हैं……

Tuesday, June 20, 2017

बनिया तो चतुर ही होगा


अब मेरी समझ में आया कि शब्दकोष में हर शब्द के कई मायने क्यों दिए जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि उसका इस्तेमाल करने वाले लोग अलग-अलग राजनीतिक दल विविध सोच लिए होते हैं और वे अपनी जरूरत के अनुसार किसी शब्द का अर्थ गढ़ सकते है। इसमें शब्दकोष उनकी मदद करता है। ठीक वैसे ही जैसे कि जब कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में दोनों पक्षों के बीच जमकर जुतम पैजार हुई, जूते चप्पल और माइक तक एक दूसरे पर खींच कर मारे गए तो एक कार्टून में किसी नेता को हाथ में जूता व माइक लिए यह कहते दिखाया गया कि यह चलने और बोलने के काम भी आते है।

जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो पार्टी ने अपने अंदरूनी हालात जानने के लिए एक सर्वे करवाया। सर्वे करवाने वाली कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि “कांग्रेंस लीडरशिप इज एजेड एंड जेडेड” मैने तुरंत शब्दकोष का सहारा लिया तो वहां जेडेड शब्द के कई अर्थ दिए गए थे। इसका एक अर्थ मरियल घोड़ा भी था। मेरी मनोकामना पूरी हो गई और मैंने अखबार में खबर छाप दी कि कांग्रेस द्वारा कराए गए सर्वे का अपना मानना है कि पार्टी नेतृत्व बूढ़ा व मरियल घोड़े जैसा है।

इस पर जबरदस्त हंगामा हुआ और सीताराम केसरी ने मुझे नींद से जगा कर जमकर खरी खोटी सुनाते हुए कहा कि सामने तो मुझे चचा कहते हो और अखबार में मुझे बुढ़ा मरियल घोड़ा बताते हो।

अब ठीक वैसा ही विवाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा हाल ही में महात्मा गांधी को बहुत चतुर बनिया बताते हुए कहा कि उन्होंने ठीक ही कहा था कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए क्योंकि न तो यह पार्टी किसी सिद्धांत पर आधारित थी और न ही उसकी कोई विचारधारा थी। वह तो आजादी हासिल करने के लिए गठित की गई स्पेशल परपज वैहिकिल की तरह थी।

उनके यह कहने के बाद हंगामा खड़ा हो गया। महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी से लेकर जाने-माने इतिहासकार व गांधी विशेषज्ञ रामचंद गुहा ने उनके इस बयान की निंदा की। कांग्रेंस से लेकर तृणमुल कांग्रेस तक ने गांधी को चतुर बताए जाने पर शाह को घेरने की कोशिश की। यह सब देख व पढ़ कर मुझे याद आया कि जब हम छोटे थे तो अक्सर पर्यायवाची शब्द याद करते थे। तब चतुर का मतलब होशियार होता था। किसी फिल्म में महमूद ने एक गीत भी गाया था जिसके बोल थे एक चतुर नार बड़ी होशियार। हां, जब पंचतंत्र की कहानियों में लोमड़ी के लिए चतुर शब्द का इस्तेमाल किया जाता तब जरूर उसका अर्थ चालाक हो जाता था। वैसे चालाक होना बहुत बुरी बात नहीं है। खासतौर से जब तक कि कोई किसी को अपनी चालाकी से नुकसान न पहुंचाए। अगर बापू को चालाक भी कहा जाए तो उसमें कोई गलती नहीं है।

एक समय अंग्रेज दुनिया की सबसे चालाक कौम हुआ करती थी। उन्होंने अपनी चालाकी के चलते ही कुछ सौ सैनिकों को साथ ला कर भारत पर राज किया। उनके साम्राज्य में सूरज डूबता ही नहीं था। भारत को गुलाम बनाने और उसे जम कर लूटने के बाद भी वे बड़े मजे से हमें टा टा करते हुए इस देश से रवाना हुए। अपने शर्मनाक कारनामों के बावजूद उन्हें गुलाम देशों का क्लब राष्ट्रमंडल बनाया जिसके आयोजन पर भारत सरीखे देश भी खुद को गौरांवित महसूस करते हैं। जब राष्ट्रमंडल खेल होते है तो हम चाहते है कि हमारे पुराने आंका ब्रिटेन की महारानी उसका उद्घाटन करे। अगर वे नहीं आ सकती हो तो कम से कम अपने किसी प्रतिनिधी को भेज दे। तब उन अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए बाध्य कर देने वाले गांधी उनसे ज्यादा चालाक व चतुर कहे जाएंगे या नहीं?

आकार पटेल ने महात्मा गांधी को चतुर बनाए जाने पर अपने कॉलम में लिखा कि गुजरात में चतुर एक अच्छा सम्मानवाचक शब्द माना जाता है। वहां की जनसंख्या में महज दस फीसदी लोग ही बनिए है जो कि सांस्कृतिक दृष्टि, उदारता, अहिंसा, गोरक्षा व्यापार, शाकाहारी होने सरीखे गुणों के कारण पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। वहां बनियों की अहमियत तो उन ब्राह्मणों से भी ज्यादा है जो कि उत्तर भारत से आए थे। आजादी के आंदोलन में पहले मराठी व बंगाली ब्राह्मण हावी थे बाद में उस पर गुजराती बनिए, गांधी, पटेल, जिन्ना हावी हो गए। जिन्ना खोजा मुसलमान थे जोकि वहां का व्यापारी समुदाय है। अमित शाह तो खुद भी बनिया (जैन) है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मोध बनिए है।

गुजराती के कहावत कोष में लिखा है कि बनिए की मूंछ नीची होती है। वह कभी ठाकुरों की तरह अपनी मूंछे मरोड़ कर किसी को चुनौती नहीं देता है बल्कि बड़ी विनम्रता से अपना काम निकाल लेता है। उसका मानना है कि महज दिखावे के लिए अभिमान या झूठी शान जताने से क्या फायदा? बनिए अपनी बुद्धि और कंजूसी दोनों के लिए प्रसिद्ध है। मैं इसी कॉलम में लिख चुका हूं कि पहले बनियों को व्यापार के लिए ही जाना जाता था मगर अब वे हर क्षेत्र में हावी हो चुके हैं। आप किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम दिखाने वाला विज्ञापन देखिए उसमें हर तीसरा प्रतियोगी बनिया नजर आएगा। आईआईटीजी हो, पीएमटी हो, सिविल सेवा हो या कुछ और आपको बंसल, अग्रवाल, जिंदल, मोदी, गुप्ता आदि ही नाम नजर आएंगे। उनकी बुद्धि का जवाब नहीं। सीए, कंपनी सेक्रेटरी से लेकर डाक्टर व आईपीएस तक सभी क्षेत्रों में उन्होंने धूम मचा कर रख दी है।

पिछले साल महज 250 रुपए में सेल फोन देने के लिए बुकिंग करने वाला रिगिंग टोन कंपनी का मालिक मोहित गोयल भी कोई युवा बनिया ही था। देश के तमाम बड़े समाचार पत्रों के मालिक बनिए ही है। चाहे वह हिंदुस्तान टाइम्स हो, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया अथवा जागरण, अमर उजाला या भास्कर। महात्मा गांधी तो खुद भी अखबार निकाल चुके थे। जयशंकर से लेकर मैथलीशरण गुप्त सरीखे साहित्यकार भी बनिए ही थे। अपना मत है कि बनिए कंजूस होते हैं मगर वे दान पुण्य में काफी आगे रहते हैं। शादी और मकान बनाने में अपनी थैलियां खोल देते हैं। पिछले दिनों श्मशान घाट जाना पड़ा। वहां खड़े-खड़े नजर दौड़ाई तो पता चला कि हर घाट, कमरे वातानुकूलित हाल पर किसी न किसी बनिए का नाम लिखा था। मैं सोच में पड़ गया कि अगर बनिए नहीं होते तो शायद हिंदुओं का अंतिम क्रिया कर्म भी ढंग से नहीं हो पाता।

वृंदावन जाने वाले 80 फीसदी लोग बनिए होते हैं। वे धर्मशालाएं, मंदिर, कुंए, बावड़ी बनवाते हैं। अगर बनिए न होते तो वृदावन मथुरा के पुजारी अन्ना बन कर रह जाते। व्यापारी, बैकर, साहूकार सभी बनिए ही तो हैं। अगर बनिया चालाक नहीं होगा तो कौन होगा? आकार पटेल ने खुलासा किया है कि गुजरात में मोदी मोध बनिए होते हैं। जोकि वितरक व एक दाम पर काम करने वाले होते हैं। उनमें लचीलापन या किसी को अपने में समाहित करने का गुण नहीं होता है।

बनियों पर खोज करते हुए किसी ने एक चुटकुला सुनाया। एक बार अरब का कोई शेख बहुत बीमार पड़ गया। उसे खून की सख्त जरूरत थी। उसके बनिया दोस्त ने उसे अपना खून दिया। शेख ठीक हो गया और उसने कृतज्ञता जताते हुए उसे अपनी मर्सीडीज कार उपहार में दे दी। कुछ साल बाद शेख बीमार पडा और बनिया ने उसे पुनः खून दिया। जब वह उसके ठीक होने पर उससे मिलने गया तो चलते समय शेख ने उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा पकड़ा दिया। बनिए ने इसकी वजह पूछते हुए कहा कि पिछली बार तो तुमने मुझे कार उपहार में दी थी। शेख ने मुस्कुराते हुए कहा ‘अब मेरी रगों’ में तुम्हारा खून दौड़ रहा है।

अमित शाह का महात्मा गांधी को चतुर बनिया कहना देश में हंगामे की वजह बन गया, लेकिन गुजरात के लोगों को अंचभा हो रहा है. जाने-माने स्तंभकार आकार पटेल ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भले ही देश में ‘बनिया’ शब्द लेकर आपत्ति हो रही हो, लेकिन गुजरात के बनियों को इससे कोई दिक्कत नहीं है.

चतुर का मतलब होता है चालाक, सतर्क , कुशाग्र. हालांकि चतुर बनिया कहने पर धूर्तता के हल्के तत्व का आभास होता है, लेकिन इसमें शेक्सपियर के पात्र शाइलॉक जैसी धूर्तता नहीं है. बनिया शब्द में कठोरता नहीं एक तरह का लचीलापन है. बनिया जाति के लोग सेना में सबसे कम है. इसका मतलब क्या वे कायर होते हैं. बिल्कुल नहीं.

बनिया दांव लगाता है, सोच-समझकर, ऐसा दांव, जिसे जाट भी लगाने से घबराएगा. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी, जिन्ना और पटेल जैसे गुजरातियों से पहले मराठी और बंगाली ब्राह्मणों का वर्चस्व था. लेकिन गुजरात की संस्कृति की लोच और अहम को किनारे रखने के गुण के जरिए सौदेबाजी की कला ने उन्हें अपरिहार्य कर दिया.

Monday, June 19, 2017

सीता साहू बनी पटना की मेयर


जीत के बाद मिठाई खातीं सीता साहू।

पटना. मेयर चुनाव महागठबंधन को बड़ा झटका लगा है। एनडीए समर्थित उम्मीदवार सीता साहु ने पटना मेयर की कुर्सी अपने नाम कर लिया है। सीता पटना की पहली महिला मेयर होंगी। कड़े मुकाबले में सीता ने रजनी राय को 3 वोट से पराजित किया है।सीता और रजनी में था कांटे की टक्कर...

पटना में मेयर पद के लिए हुए चुनाव में सीता साहू को 38 वोट मिले थे, जबकि रजनी राय को 35 वोट मिले हैं। कुल 75 वोट पड़े थे। इसमें 2 वोट अवैध घोषित किए गए थे। सीता वार्ड 58 से पार्षद चुनी गई हैं। रजनी वार्ड पार्षद 22 से चुनी गई हैं। इन दोनों के बीच शुरू से ही कांटे की टक्कर थी। रजनी को महागठबंधन के नेताओं का समर्थन प्राप्त था, जबकि सीता साहू को एनडीए का समर्थन प्राप्त था।

पटना नगर निगम मेयर-डिप्टी मेयर का चुनाव सोमवार की सुबह कलेक्ट्रेट सभागार में शुरू हुआ। चुनाव दलीय आधार पर नहीं होने के बाद भी इस बार मेयर चुनाव में भाजपा और महागठबंधन के विधायक मंत्रियों ने पूरी ताकत झोंक दी थी।

मुकाबला भाजपा गुट की सीता साहू और महागठबंधन गुट की रजनी देवी के बीच शुरू से चल रहा था। दोनों गुटों का दावा था कि उन्हें 50 से अधिक पार्षदों का समर्थन है। भाजपा गुट के पार्षदों का नेतृत्व विधायक नितिन नवीन अरुण सिन्हा और महागठबंधन गुट का नेतृत्व एमएलसी संजय सिंह और श्याम रजक नेता कर रहे थे।

सीता साहू

साभार: दैनिक भास्कर