Sunday, October 22, 2017

वैश्य समुदाय बनाएगा अपना बैंक


Friday, October 20, 2017

TARUN GOYAL - तरुण गोयल

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अग्रभाग्वत - अदृश्य स्याही वाली प्राचीन कला की अनसुलझी पहेली

अदृश्य स्याही वाली प्राचीन कला की अनसुलझी पहेली


प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं, पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं. रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का यह रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.

जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है? अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली, जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं. 

आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुडी हुई. इस गांव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं. घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं. रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं. एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है. अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया, इसका कोई कारण उनके पास नहीं था. यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं. असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं. मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.

‘ब्रम्ह्कुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है. भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी. उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्ह्कुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है. हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्ह्कुंड दर्शन की..! वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्ह्कुंड पहुंच गए. दुसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ. रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्ह्सरोवर के तट पर एक वटवृक्ष हैं, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं. इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..! दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्ह्सरोवर के तट पर गये, तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी. रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपडे में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा, “जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.” वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१. 

आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है, लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही... असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहां वे रुके थे. उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बांधकर रखे थे. इन पर कुछ भी नहीं लिखा था. एकदम कोरे..! इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं, इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी. अब इसका क्या करे..? उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गांव, आमगांव, लेकर आये. लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे. बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गांव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे. रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?” गुरु ने जवाब दिया, “तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.” अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए. रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..! उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.

कुछ दिन बीत गए. एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..! जहां पर पानी गिरा था, वहां पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..! उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा. अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था. कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए. अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया. यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था. यह काम कुछ वर्षों तक चला. जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया, तब समझ में आया, की भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं. लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था. उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ. पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय. इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.

रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई. इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ. ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए. इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की. यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया. इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी. आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं. रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.

यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं. जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..? इसका उपयोग कैसे किया जाता था..? कहां उपयोग होता था, इस तकनीक का..? भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं. ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.

मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था. यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं. इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था. उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था. फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बांधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था. यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे. भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था. भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं. लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं. भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है. परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पध्दतियां थी, जिनकी जानकारी मिली हैं. आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था. चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं. केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.

मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था. कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे. पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था. फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपडे में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे. और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी. बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे. काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है. आश्चर्य इस बात का हैं, की जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं. जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं. पानी से मिटती नहीं. उलटें, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं. इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था. यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे. अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा. इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं. उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ. लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूं कहे, "आजकल का शास्त्रशुध्द विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है. स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिध्द हो चुका है..! दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है. यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके. 

साभार : 

desicnn.com/news/ancient-indian-knowledge-about-chemicals-and-colours-are-excellent-till-today-science-could-not-match-this By प्रशांत पोळ



THE DIAMOND KING - NEERAV MODI - नीरव मोदी

पढ़ाई छोड़ लौटे भारत, 19 की उम्र में कारोबारी दुनिया में रखा कदम, आज हैं सबसे रईस जौहरी


यह कहानी है उस शख्स की जिनके नाम से हम अपरिचित हैं लेकिन देश की आभूषण इंडस्ट्री में उनकी तूती बोलती है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देश की डायमंड इंडस्ट्री में सबसे बड़े नाम नीरव मोदी की। एक समय राजा-महाराजा, रानियों के गले, बाजूओं और मुकुट को सुशोभित करने वाले हीरे आजकल हर ज्वैलरी की दूकान में मिलने लगे हैं। यह इकॉनमी का असर है। पूरी दुनिया में हीरे की बढ़ती डिमांड जा रही और इसी डिमांड को पूरा करते हैं नीरव मोदी जैसे डायमंड मर्चेन्ट।

कौन हैं नीरव मोदी


46 साल के नीरव मूल रुप से गुजरात के रहने वाले है, जिनकी प्राइमरी शिक्षा बेल्जियम में हुई। उनके गुजराती पिता हीरे के व्यापार से जुड़े थे और इसी धंधे को नीरव मोदी ने पेशा बनाया। नीरव देश ही नहीं, दुनिया के पहले डायमंड बिजनेसमैन हैं, जो अपनी डिजाइंड ज्वैलरी का ब्रांडनेम भी है। लेकिन गुजरात के इस हीरे व्यापारी को शोहरत तब मिली जब क्रिस्टी ज्वैलरी आॅक्शन (2010) में नीरव मोदी की कंपनी फायर स्टार डायमंड का गोलकोंडा नेकलेस 16.29 करोड़ रुपए में बिका और नीरव मोदी ब्रांड को ग्लोबल पहचान मिली। उनके एक और हार ने तहलका तब मचाया जब उसकी कीमत 50 करोड़ रुपये लगाई गई, नीरव मोदी ने अपने ही नाम से 25 बड़े लग्जरी स्टोर दिल्ली से हांगकांग और मुंबई से लेकर न्यूयार्क में खोला है। 2016 की फोब्स सूची के मुताबिक 11,237 करोड़ की संपत्ति के मालिक नीरव देश के सबसे रईस लोगों की गिनती में 46वें पायदान पर खड़े हैं।

कैसे हुई सफ़र की शुरुआत

नीरव मोदी हीरा व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। किशोर उम्र में वे पढ़ाई के लिए व्हॅार्टन स्कूल (यूएस) गए थे, पर 1990 में मामा मेहुल चौकसी का बुलावा आ गया। मात्र 19 साल की उम्र में वह अपने मामा मेहुल चौकसी के पास हीरे के व्यापार का गूढ़ मंत्र सीखने मुंबई पहुंच गए थे। गीतांजलि ग्रुप के सीएमडी मेहुल चौकसी देश में तब ज्वैलरी फैक्ट्री लगा रहे थे। नीरव ने पढ़ाई को अलविदा कहा और गीतांजलि ग्रुप में ज्वैलरी मैन्यूफैक्चरिंग व मार्केटिंग के नुस्खे सीखे।

कारोबारी बारीकियों को सीखने के बाद उन्होंने डायमंड उद्योग में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का निर्णय लिया और स्थापित की फायर स्टार डायमंड। उन्हाेंने अमेरिकन ज्वैलर्स को लूज डायमंड्स सप्लाय से कारोबार की शुरुआत की पर लक्ष्य था, अपना लग्जरी डायमंड ज्वैलरी ब्रांड बनाना। 1999 में नीरव ने खुद कुछ बड़ा करने की ठानी। उन्होंने दुनिया के नायाब हीरों की खोज शुरू कर दी। सिएरा लियोन से लेकर रूस तक के हीरे की खदानों से उन्होंने हीरे जुटाए और बन गए रेयर डायमंड के सबसे बड़े जौहरी।

खुद के नाम ही है एक ब्रांडनेम


नीरव की कंपनी का नाम यूँ तो फायरस्टार डायमंड के नाम से है पर उनके द्वारा तैयार किये गए डिज़ाइन्स नीरव मोदी के नाम से ही बिकते हैं। लोग उनके द्वारा तैयार किये डिज़ाइन को ख़ास तौर पर पसंद करते हैं और उनकी कीमत भी करोड़ों में होती है। आर्ट व म्यूजिक के शौकीन नीरव अपनी ज्वैलरी खुद डिजाइन करते हैं। उनके कारीगर इस डिजाइन से प्रोटाेटाइप बनाते हैं और अंतिम मैन्यूफैक्चरिंग नीरव के अप्रूवल के बाद ही होती है।

बड़े- बड़े सेलेब्स और बिज़नेसमैन हैं ग्राहक


मौजूदा समय में मुंबई में रह रहे मोदी दुनिया के बड़े डायमंड मार्केट में अपने ज्वेलरी की नुमाइश लगाते हैं। यहां खरीदारों की पहली शर्त यह होती है कि वह कोई खरबपती हो। नीरव मोदी ब्रांड ज्वैलरी की मूल्य रेंज 10 लाख से 50 करोड़ है। उनके ग्राहक हैं दुनिया के रईस और सेलिब्रिटीज। इसकी पुष्टि इसी बात से हो जाती है कि भारत के ही टॉप 10 अमीरों में से 6 उनके नियमित ग्राहक हैं। बॉलीवुड के भी बड़े-बड़े नामचीन कलाकार उनकी ज्वेलरी के मुरीद हैं। उनकी कंपनी फायर स्टार की दुनियाभर में ऑफिस हैं। कंपनी का मौजूदा टर्नओवर 10 हजार करोड़ से ज्यादा हो चुका है।

नीरव चाहते तो उनके पास पिता का बना बनाया कारोबार था लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से अपना नाम बनाया और आज देश के सबसे बड़े जौहरी की फेहिस्त में शामिल हैं।

साभार: 


hindi.kenfolios.com/nirav-modi-diamond-merchant/by Sandeep Kapoor10/20/2017

Tuesday, October 17, 2017

SOURAV MODI - सौरव मोदी



बहुत कम लोग ही हैं जो अपनी अच्छी-खासी कॉर्पोरेट नौकरी को छोड़कर एक उद्यमी बनने का ख्वाब देखते हैं, लेकिन बेंगलुरु के 23 साल के सौरव मोदी ने बिलकुल कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट की जॉब छोड़कर बिसनेस में हाथ आजमाने की कोशिश की और आज एक सफल उद्यमी हैं।

13 साल बाद आज जब वे पलट कर पीछे देखते हैं तो अपने 2015-16 के 6.5 करोड़ के टर्न-ओवर के साथ उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। आज उनकी कंपनी बैग्स, बेल्ट, वॉलेट्स जैसे जूट प्रोडक्ट्स और कॉर्पोरेट गिफ्ट्स बनाती है। उनके प्रोडक्ट्स भारत के लगभग सभी रिटेल चेन में उपलब्ध हैं और कुछ यूरोपियन देशों में भी ये प्रोडक्ट निर्यात किये जाते हैं। बिना किसी शुरूआती अनुभव के शुरू कर उन्होंने धीरे-धीरे खुद से ही सब-कुछ सीखा और आज सफ़लता उनकी कदम चूम रही।

सौरव एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं और उन्होंने अपना बिज़नेस सिर्फ 8000 रूपये से शुरू किया वो भी अपनी माँ से कर्ज लेकर। उन्होंने सबसे पहले 1800 रुपये की एक सेकंड-हैण्ड सिलाई मशीन खरीदकर और एक पार्ट टाइम टेलर को जॉब में रखकर एक किराये के 100 स्क्वायर फीट के गेराज से अपना यह बिज़नेस शुरू किया। उनका यह शुरुआती दौर काफी मुश्किलों भरा था। सौरव 2007 में बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, जब उनके 30 काम करने वालों ने स्ट्राइक कर दी पर उन्होंने इस कठिन समय को भी अपने साहस और मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर झेल गए। आज उनके पास करीब 100 से ज्यादा काम करने वाले लोग हैं और उनकी यह फैक्ट्री बेंगलुरु के कामाक्षीपाल्या में 10,000 स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैल चुका है।

क्राइस्ट कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन करने के पश्चात् सौरव ने अर्न्स्ट एंड यंग कंपनी में टैक्स एनालिस्ट की नौकरी ज्वाइन की और वहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल गुजारे। इसके बाद वे यूएस से एमबीए करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उनका सपना अधूरा ही रह गया।

मैंने कैलिफ़ोर्निया की यूनिवर्सिटी से एमबीए के लिए अपनी सीट सुरक्षित कर रखा था पर पीछे मुड़कर देखने से यह लगता है कि शायद यही मेरी नियति थी – जूट के सामान बनाना — सौरव मोदी

कुछ दिनों तक कॉर्पोरेट जॉब करने के बाद सौरव अपने पिता के बिज़नेस में लग गए। दो साल पिता के साथ काम करने के बाद कुछ नया करने की चाह में उन्होंने पिता का बिज़नेस छोड़ दिया। पिता ने भी उनके इस निर्णय का सम्मान किया क्योंकि वे खुद भी एक सेल्फ-मेड आदमी थे।


अपने पिता के सुझाव पर उन्होंने जूट के बिज़नेस में अपना भाग्य आजमाया क्योंकि बेंगलुरु में एक भी जूट प्रोडक्ट्स का उद्योग नहीं था और फिर उनका यह आईडिया जस्ट जूट के नाम से उभर कर सामने आई। पिता के कस्टमर के द्वारा ही उनकी कंपनी को पहला ऑर्डर 500 जूट बैग बनाने का मिला। उनका सबसे बड़ा ऑर्डर 70,000 रूपये का था जो एक कैंडल एक्सपोर्टर ने उन्हें दिया और फिर इस तरीके से उनका यह बिज़नेस चल पड़ा। और जैसे-जैसे उनके पास पैसे आते गए उनका बिज़नेस बढ़ता चला गया।

किसी भी बिज़नेस में बने रहने के लिए चीज की गुणवत्ता का होना अति आवश्यक है। एक खुश ग्राहक दस संभावित ग्राहक के बराबर होता है। — सौरव मोदी

साल 2008 में उनका विवाह निकिता नाम की एक लड़की से हुआ, जो डिजाईन बैकग्राउंड से ताल्लुक रखती थी और इसलिए निकिता ने भी इस बिज़नेस को आगे बढ़ाने में सौरव की पूरी मदद की। आज उनके इस जूट बिज़नेस में विस्तृत कलेक्शन के हैंडबैगस, स्लिंग्स, वॉलेट्स, लैपटॉप बैग्स, और ऐसे बहुत सारे जरूरतमंद प्रोडक्ट्स हैं। इसके अलावा कुछ ऑर्गेनिक कॉटन और पोल्यूरेथेन जैसे फैब्रिक्स में प्रयोग करके उन्होंने और भी बहुत सारे प्रोडक्ट्स बनाये हैं। सौरव ने अपना बिज़नेस जस्ट जूट का लक्ष्य निर्धारित किया है कि आने वाले दस सालों में उनकी कंपनी का टर्नओवर लगभग 100 करोड़ हो जायेगा।

साभार: hindi.kenfolios.com/saurav-modi-ceo-of-just-jute/by Anubha Tiwari